Sunday, 5 February 2017

आत्म स्वीकार Kavita 261

आत्म स्वीकार

मैं रोज़ आत्महन्ता दौर से गुज़रती हूँ
खुद को थोड़ा-थोड़ा रोज़ मारती हूँ
धीमी मौत मर रही हूँ मैं.

आत्मदया से विगलित रहती हूँ हर पल
कोई मुझ पर दया क्यों करे?
मुझे अपना ध्यान खुद ही रखना है.

आत्मग्लानि से भर-भर जाती हूँ मैं
जब कोई देख कर भी अनदेखा कर देता है
सूँघने लगती हूँ अपने को.

सब हमेशा सही होते हैं
मैं हमेशा खुद को गलत लगती हूँ
हीन भाव कूट-कूट कर भरा है मेरी रगों में.

मैं हड्डी-मांस का ढाँचा हूँ
इंसान की शक्ल में ज़रूर हूँ
पर आत्म-रक्षा कवच मेरे पास नहीं है.

जंगलों में भाग जाना चाहती हूँ
पहाड़ों की गुफ़ाओं में रहना चाहती हूँ
पर वह कभी नहीं होगा जो मैं चाहती हूँ.

अकेले होने का शौक भी है और डर भी
जीवन सुन्दर भी है और कहर भी
मिल जाए कहीं तो ख़ुशी से पी लूँगी ज़हर भी.

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