Tuesday, 14 February 2017

अपने वैलेंटाइन को याद करते हुए Kavita 262

अपने वैलेंटाइन को याद करते हुए
आज भी वह नए-नए नाम रख कर
नए-नए रूप धर कर
भेजता है शब्द मुझे।
मेरा उसका शब्दों का रिश्ता है।
मेरे शब्द खींचते हैं उसे
इसीलिए वह लौटता है मेरे पास
बार-बार।
उसके शब्द खींचते हैं मुझे
इसीलिए हर समय खुले रखती हूँ
उसके लिए द्वार।
वह हवा की तरह आता है
हवा की तरह जाता है
महक उठता है मेरे जीवन का सांध्य काल
महक उठती है मेरी रूह
मेरी आत्मा।
यह रिश्ता रूह का रूह से है
आत्मा का आत्मा से।
कहानी कोई बने, न बने
कवितामय हो उठी प्रकृति में
मेरी हर कविता उसके नाम।

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